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सचिन से बोलीं कलेक्टर- मेरे बच्चे सोचते थे कि मैं सुपरमैन की तरह कोरोना से लड़ रही हूं, अब चाहते हैं ये कहानी जल्द खत्म हो

आज दुनियाभर में विभिन्न व्यवसायों से जुड़ी मांएं घर-परिवार छोड़कर निस्वार्थ भाव से कोविड-19 से लड़ रही हैं। इनमें से कइयों को तो घर जाने का मौका भी नहीं मिला। आज जब पूरा देश इन योद्धाओं के समर्थन में खड़ा है और इनके योगदान को दिल से सराह रहा है, ऐसे हालात में हम उनका जितना भी आभार मानें, कम ही होगा। भारत रत्न सचिन तेंदुलकर ने मदर्स डे पर ऐसी मांओं से बात की जो फ्रंटलाइन पर कोरोना का डटकर मुकाबला कर रही हैं। इनमें कलेक्टर, एसपी, डॉक्टर्स, नर्स से लेकर समाजसेवी तक शुमार हैं। पेश है कोविड चैंपियंस मांओं से सचिन की बातचीत...

सचिन- मेरा पहला प्रश्न वायनाड कलेक्टर आदिला अब्दुल्ला से है। आप अपने परिवार और व्यस्त दिनचर्या में सामंजस्य कैसे बनाकर रखती हैं?
आदिला- शुरू में बड़ी मुश्किल हुई। मेरे 3 छोटे बच्चे हैं और तीनों सात साल से छोटे हैं। मेरा सबसे छोटा बच्चा डेढ़ साल का है, जिसे मुझे फीड भी करना होता है। इस लिहाज से देखें तो मैं दो फ्रंट पर युद्ध लड़ रही हूं। एक तरफ तो ये सुनिश्चित करना है कि आम जनता में संक्रमण न फैले वहीं ये भी बहुत जरूरी है कि मेरी वजह से मेरे बच्चे संक्रमित न हो जाएं।

शुरूआती एक हफ्ते में तो एडजस्ट करने में बड़ी दिक्कतें आईं। मेरे बच्चों को मुझे उनके पिता के पास छोड़ना पड़ता था तो कभी अपनी मां से मदद लेनी पड़ती थी। शुरुआत में मैं बच्चे को दोपहर में सिर्फ एक बार फीड कर पाती थी। पर जैसे-जैसे सिस्टम बनता गया चीजें नियंत्रित होती गईं। लेकिन, अब बच्चों को कोरोना से नफरत हो गई है।

उनमें एक बदलाव जो मैं देखती हूं वो ये है कि अब वो क्रेयान्स या खेलने-कूदने या मॉल जाने की मांग नहीं करते। वो सिर्फ ये चाहते हैं कि जल्द से जल्द कोरोना का अंत हो जाए ताकि वो मां के साथ पहले जैसे समय बिता सकें। पहले उन्हें ऐसा लगता था कि जैसे उनकी मां किसी सुपरमैन या बैटमैन की तरह कोरोना से लड़ रही है, लेकिन अब वो चाहते हैं कि ये स्पाइडरमैन या बैटमैन की कहानी खत्म हो।

सचिन- मेरा दूसरा सवाल काेच्चि की डिप्टी पुलिस कमिश्नर जी. पुंगझली से है। बच्चों को बड़ा अच्छा लगता है जब वो किसी के पुलिस अफसर बनने की बात सुनते हैं तो। एक पुलिस ऑफिसर मां होने के नाते संकट के समय में आप बच्चों को क्या संदेश देंगी?
जी पुंगझली- मेरा सबसे पहला संदेश हर बच्चे, उसकी मां और उसके परिवार को ये होगा कि चीजों को बांटना सीखें ताकि जिम्मेदार नागरिक बन सकें। मेरा दूसरा संदेश ये होगा कि वो गलती करने से न डरें और हर हाल में कुछ नया सीखने की कोशिश करें क्योंकि जीवन सफलता और असफलता, दोनों से मिलकर बनता है।

ऐसे में बच्चों को ये सिखाना जरूरी है कि वो अपनी असफलताओं को स्वीकारें और ये सीखें कि वो अपनी असफलताओं से उबर कैसे सकते हैं। हम सबको याद रखना होगा कि सिर्फ एक जिम्मेदार मां ही एक जिम्मेदार बच्चे का निर्माण कर सकती है, क्योंकि अधिकतम स्थितियों में बच्चों का जुड़ाव अपनी मां से अधिक होता है इसीलिए मां की जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है कि वो अपने बच्चों को सिखाएं कि वे समाज में कैसे अपना योगदान दे सकते हैं। ये सबसे महत्वपूर्ण है।
सचिन- ये एक शानदार संदेश है। मैं मानता हूं कि हर महिला अपने परिवार की रीढ़ की हड्डी होती है।

सचिन- मेरा तीसरा सवाल कानूनी पेशे से जुड़ी यूके की अमृता जयकृष्णन से है। कोविड 19 से गुजरना अपने आप में मुश्किल रहा होगा। आप न सिर्फ उबरीं बल्कि आप फिर से कोरोना संक्रमित मरीजों की सेवा में लग गईं। इस दौरान आपने कैसा महसूस किया?
अमृता जयकृष्णन- मेरे पति एक डॉक्टर हैं और वो मरीजों की सेवा में तब से ही लगे हैं जब से यह संक्रमण यूके में फैला। एक कोविड योद्धा की पत्नी होने के नाते मैं और मेरे पति, जानते थे कि इस लड़ाई में कितने खतरे हो सकते हैं। जैसा कि अंदेशा था हम दोनों ही बीमार पड़े। हमारे पास 14 दिन के आइसोलेशन में जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।

मुझे डर वायरस के लक्षण से उतना नहीं था जितना उस अनजान परिस्थिति से था जिसकी तरफ हम सब बढ़ रहे थे। यूके में अनगिनत ऐसी लैब हैं जहां उपकरण और टेक्नीशियन दोनों हैं, लेकिन यहां कोविड 19 की टेस्टिंग नहीं हो रही थी। हमने ऐसी लैब से संपर्क शुरू किया ताकि इन्हें जरूरी वित्तीय सहायता देकर कोरोना की टेस्टिंग के लिए तैयार किया जा सके।

इस प्रोग्राम में बहुत सारे लोग स्वेच्छा से 24 घंटे जुटे हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि कई छोटे युद्धों को मिलाकर एक बड़ा युद्ध बनता है और बहुत छोटे-छोटे योगदान को मिला लें तो युद्ध जीता जा सकता है। मुझे खुशी है कि मैं इस कोरोना युद्ध में एक छोटा सा हिस्सा बन पाई हूं।

  • अग्रिम मोर्चे पर कोरोना से लड़ रही मांओं ने भी सचिन से पूछे सवाल

बर्मिंघम में पीडियाट्रिक्स कंसल्टेंट डॉ. दीप्ति ज्योतिष ने सचिन से पूछा कि आपके कॅरिअर के चुनाव के मामले में आपकी मां का क्या योगदान रहा है?

सचिन- आज की ही चर्चा में हमने सुना कि पेरेंट्स को स्वतंत्रता देनी चाहिए ताकि बच्चे अपने कॅरिअर का चुनाव खुद कर सकें। मेरे परिवार में भी ऐसा ही माहौल था। मेरा परिवार बड़ा है तो मेरे भाई-बहनों और माता-पिता से लेकर मेरे चाचा-चाची ने भी इस बात पर जोर दिया कि अगर मैं क्रिकेट खेलना चाहता हूं तो मुझे मौका मिलना चाहिए और हमें उसकी मदद करनी चाहिए।

अब मुझे क्रिकेट खेलना है ये निर्णय मेरी मां का नहीं था, मेरे भाई का मार्गदर्शन था, जिसे मेरे मां-पापा का आशीर्वाद मिला। प्रोफेसर होने के बावजूद मेरे पिता ने भी मुझे सपोर्ट किया। मेरी मां तो बस यही चाहती थीं कि मैं स्वस्थ और खुश रहूं। मुझे तो बस इतना याद है कि बचपन से ही अगर मुझे कुछ चाहिए होता था तो मैं मां के पास जाता था। मेरी मां तो मेरे लिए ढाल की तरह रही हैं, जिसने सिर्फ और सिर्फ मेरी रक्षा की।
आप घर के बाहर खेलते रहे हैं और आज लॉकडाउन की वजह से बच्चे घर में कैद हैं। आप क्या सलाह देंगे?
सचिन- पहली सलाह तो यह है कि सिर्फ समस्या को देखेंगे तो तनाव बढ़ेगा। पर जैसे ही आप समस्या के हल की तरफ सोचना शुरू करेंगे आप बेहतर होते चले जाएंगे। मैं अपनी चाची को गोल्फ की गेंद थमाता था ताकि मैं बैकफुट डिफेंस प्रैक्टिस कर सकूं, तो कभी मोजे में गेंद डाल रस्सी से लटकाकर कमरे में प्रैक्टिस किया करता था। आपके लक्ष्य के अनेक आयाम होते हैं। कई बार घर पर रहकर आप उन आयामों पर काम कर पाते हैं जिन पर आप ग्राउंड पर ध्यान नहीं दे पाते। ऐसे ही ये लॉकडाउन भी आपके लिए कोई अड़चन नहीं है, अवसर भी बन सकता है।

यह अप्रत्याशित समय और चुनौतियां अनगिनत

सौम्या भूषण (पत्रकार)- हम खुशकिस्मत हैं कि लॉकडाउन में परिवार के साथ समय बिताने का मौका मिल रहा है। आपका दिन कैसे बीत रहा है?
सचिन- मैं यह नहीं मानता कि खुशकिस्मती जैसी कोई चीज लॉकडाउन में है। किसी भी सूरत में आप ऐसी परिस्थिति से दोबारा नहीं गुजरना चाहेंगे। यह अप्रत्याशित समय है और चुनौतियां अनगिनत हैं। 3 महीने पहले किसी ने भी ऐसी परिस्थितियों की कल्पना नहीं की होगी। लेकिन, आज पूरी दुनिया नए तरीके से सोचने पर विवश हो गई।

हां, मुझे अपने परिवार के साथ पहले से अधिक समय बिताने का मौका जरूर मिल रहा है। 15 मार्च के बाद मैं अपने किसी मित्र से एक बार भी नहीं मिला हूं। मैं अपने सारे दोस्तों को भी यही कह रहा हूं कि सरकार के दिशा-निर्देश का आदर करें क्योंकि मैं भी यही कर रहा हूं। मेरी मां के साथ मुझे समय बिताने का मौका मिल रहा है।

महिलाएं ही परिवार का आधार होती हैं...

डॉ. मिनी पीएन ने पूछा कि आपने अपनी पत्नी अंजलि को भी एक सशक्त मां के रूप में देखा है। आपका इस पर क्या कहना है?
सचिन- इस विषय पर बोलने के लिए मेरे पास शब्द कम पड़ते हैं। अंजलि का कॅरिअर अपने आप में काफी सफल था, पर जब हमारा परिवार बढ़ा तो उसने आगे होकर परिवार पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला लिया। महिलाएं परिवार का आधार होती हैं। असल में यह योगदान महिलाओं का है जो कभी मां, बहन के रूप में या सास के रूप में भी समाज को मिलता है। यही कारण है परिवार आगे बढ़ते हैं। मुझे गर्व है मेरी पत्नी पर कि मेरी गैरमौजूदगी में भी उन्होंने मेरे दोनों बच्चों की बहुत अच्छे से परवरिश की। अंजलि मेरे लिए खुशकिस्मती है और किसी किस्म की शिकायत की मेरे पास कोई वजह नहीं है।

डॉ. संध्या कुरूप (कोझिकोड में कोविड सेल की नोडल ऑफिसर)- आपकी मां 2013 में आपका खेल देखने के लिए स्टेडियम में आई थीं, कैसा अनुभव था?

सचिन- आप विश्वास नहीं करेंगी कि मेरे जीवन में वो इकलौता मैच था, जिसमें मैं खेलते समय अपनी मां को देख पा रहा था। ये मेरी आखिरी ख्वाहिश थी। वो मेरा आखिरी मैच था। मुझे याद है जब मैं आखिरी ओवर खेल रहा था, तब मेगास्क्रीन पर हर बॉल मेरी मां को दिखाकर फेंका गया, जो कि मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। मैं हर बॉल के साथ मां को स्क्रीन पर देख पा रहा था, लेकिन मां को नहीं पता था कि वो कैमरे की निगरानी में है।



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सचिन तेंदुलकर ने कहा कि मैं मानता हूं कि हर महिला अपने परिवार की रीढ़ की हड्डी होती है।  


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